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104 वर्षीय लखन लाल को 43 साल बाद मिली आजादी, न्यायपालिका पर उठे सवाल#crime
Ashok Pawar MD
(DELHI, NEW DELHI)
104 वर्षीय लखन लाल को 43 साल बाद मिली आजादी, न्यायपालिका पर उठे सवाल#crime
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उत्तर प्रदेश - पीलीभीत में रॉग साइड से आयी एक स्कॉर्पियो कई बाइक सवारों को कुचलती हुई 3 लोगों को समेटकर अपने साथ ले गयी एक बच्ची और 2 बड़े लोग जूस के ठेले के पास खड़े थे tbhi अचानक स्कॉर्पियों आई और उन्हें टक्कर मारती हुई घसीटकर ले गयी बच्ची और एक व्यक्ति थोड़ी दूर पर स्कॉर्पियों की जद से बाहर आ गये मगर एक शख्स को बेकाबू स्कॉर्पियों 100 मीटर तक घसीटती रही,उसकी मौत हो गयी है
भयावह वीडियो है हरियाणा में 4 बदमाशों ने एक युवक को मारने के इरादे से करीब 35 से 40 राउंड फायरिंग कर दी वीडियो में दिख रहा है कि एक बदमाश मैगजीन खाली होने के बाद गाड़ी तक जाता है, फिर दोबारा हथियार लोड करके लगातार गोलियां चलाता है हैरानी की बात यह है कि आसपास से वाहन गुजरते रहे, लेकिन बदमाश बेखौफ होकर फायरिंग करते रहे इस तरह की घटनाएं कानून व्यवस्था और आम लोगों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती हैं
▶️.....मध्य प्रदेश के खरगोन में एक 17 साल के युवक अपने दोस्तों के साथ खेल रहा था शायद दीवार से वह लोहे के गेट पर मुह के बल गिरा और लोहा उसके मुंह में जा घुसा लोहे को काट कर उसे निकाला गया इंदौर में सर्जरी हुई और लोहा मुंह से बाहर निकला
Comments (1)
Ashok Pawar MD
03 Jun, 2025104-year-old Lakhan Lal got freedom after 43 years, questions raised on judiciary 104 वर्षीय लखन लाल, जिन्होंने ज़िंदगी के 43 साल एक अपराध के लिए जेल में बिताए जो उन्होंने कभी किया ही नहीं, अब अंततः निर्दोष घोषित कर दिए गए हैं। यह चौंकाने वाला मामला न केवल भारत की न्याय प्रणाली की धीमी प्रक्रिया को उजागर करता है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करता है कि क्या वही न्यायपालिका, जो राष्ट्रपति के निर्णयों पर समयसीमा तय करती है, एक आम नागरिक को न्याय देने में इतने दशकों तक क्यों चूक गई? पूर्व जम्मू-कश्मीर पुलिस महानिदेशक शेष पाल वैद ने इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "एक 104 साल का व्यक्ति जिसने अपनी ज़िंदगी के सबसे कीमती 43 साल जेल में बिता दिए, आज़ाद तो हो गया लेकिन उस अन्याय का क्या? क्या कोई उसकी खोई हुई ज़िंदगी लौटा सकता है?" लखन लाल के मामले में यह स्पष्ट नहीं कि देरी का असली दोषी कौन है – पुलिस, अभियोजन पक्ष, या अदालतें। लेकिन इस मामले ने पूरे तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। वैद ने आगे कहा, "जिस न्यायपालिका को राष्ट्रपति के निर्णयों की समयसीमा तय करने का अधिकार है, उसी को एक निर्दोष व्यक्ति को न्याय देने में चार दशक लग गए – यह सिर्फ दुर्भाग्य नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय शर्म है।" इस मामले ने न्यायिक सुधार की आवश्यकता को फिर से उजागर किया है। क्या अब समय नहीं आ गया है कि हम अपने सिस्टम की जवाबदेही तय करें?